Counter-claim by defendant -प्रतिवादी द्वारा प्रतिदावा -Order 8 rule 6 (A) To 6(G) CPC. - CIVIL LAW

Wednesday, May 9, 2018

Counter-claim by defendant -प्रतिवादी द्वारा प्रतिदावा -Order 8 rule 6 (A) To 6(G) CPC.

प्रतिवादी द्वारा प्रतिदावा --आदेश 8 नियम 6 (क) से 6 (छ) सी. पी.सी.Counter-claim by defendant -Order 8 rule  6 (A) To 6 (G)  CPC.


 प्रतिदावा --Counter-claim

आदेश 8 नियम 6  (क) सिविल प्रक्रिया संहिता- प्रतिवादी द्वारा प्रतिदावा -
(1) बाद में प्रतिवादी नियम 6 के अधीन मुजरा के अभीवचन के अपने अधिकार के अतिरिक्त वादी के दावे के विरुद्ध प्रतिदावे के रूप में किसी ऐसे अधिकार या दावे को, जो वादी के विरुद्ध प्रतिवादी को, वाद फाइल किए जाने के पूर्व या पश्चात  किंतु प्रतिवादी द्वारा अपने प्रतिरक्षा परिदत्त किए जाने के पूर्व या अपने प्रतिरक्षा परिदत्त  किए जाने के लिए परिसीमित समय का अवसान हो जाने के पूर्व, किसी वाद हेतुक के बारे में प्रोद्धभुत हुआ हो, उठा सकेगा चाहे ऐसा प्रति दवा नुकसानी के दावा  के रूप में हो या नहीं:
  परंतु ऐसा प्रतिदावा न्यायालय की अधिकारिता की धन संबंधी सीमाओं से अधिक नहीं होगा।
(2) ऐसे प्रति दावे का प्रभाव प्रतिवाद के प्रभाव के सामान ही होगा जिससे न्यायालय एक ही वाद में मूलदावे और प्रतिदावे दोनों के संबंध में अंतिम निर्णय सुनाने के लिए समर्थ हो जाए।
(3) वादी को इस बात की स्वतंत्रता होगी कि प्रतिवादी के प्रति दावे के उत्तर में लिखित कथन ऐसी अवधि के भीतर जो न्यायालय द्वारा नियत किया जाए, फाइल करें।
(4) प्रति दावे को वाद पत्र के रूप में माना जाएगा और उसे वही नियम लागू होंगे जो वाद पत्रों में लागू होते हैं।




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नियम 6 (ख)- प्रति दावे का कथन किया जाना -जहां कोई प्रतिवादी, प्रति दावे के अधिकार का समर्थन करने वाले किसी आधार पर निर्भर करता है वहां वह अपने लिखित कथन में यह विनिर्दिष्ट कथन करेगा कि वह ऐसा प्रति दावे के रूप में कर रहा है।
नियम 6 (ग)- प्रतिदावे का अपवर्जन-- जहां प्रतिवादी कोई प्रतिदावा उठाता है और वादी यह दलित देता है कि उसके द्वारा उठाए गए दावे का निपटारा प्रति दावे के रूप में नहीं वरन स्वतंत्र  वाद में किया जाना चाहिए, वहां वादी प्रतिदावे के संबंध में विवाद्यको के तय किए जाने के पूर्व किसी भी समय न्यायालय से इस आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा कि ऐसे प्रति दावे का अपवर्जन किया जाए और न्यायालय एसे आवेदन की सुनवाई करने पर ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझें।
(घ) वाद के बंद कर दिए जाने पर प्रभाव - - यदि किसी ऐसे मामले में जिसमें प्रतिवादी कोई प्रति दवा उठाता है, वादी का वाद रोक दिया जाता है, बंद या  खारिज कर दिया जाता है ऐसा होने पर भी प्रतिदावे पर कार्रवाई की जा सकेगी।



(ड़) प्रति दावे का उत्तर देने में वादी द्वारा व्यतिक्रम - - यदि वादी प्रतिवादी द्वारा किए गए प्रतिदावे का उत्तर प्रस्तुत करने में व्यतिक्रम करता है तो न्यायालय वादी के विरुद्ध उस प्रति दावे के संबंध में जो उसके विरुद्ध किया गया है, निर्णय सुना सकेगा या प्रति दावे के संबंध में ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझें।
(च) जहां प्रति दावा सफल होता है वहां प्रतिवादी को अनुतोष-- जहां किसी वाद में वादी के दावे के विरुद्ध प्रतिरक्षा के रूप में मुजरा या प्रति दवा सिद्ध कर दिया जाता है और ऐसा कोई अतिशेष पाया जाता है जो, यथास्थिति  वादी या प्रतिवादी को शोध्य है वहां न्यायालय ऐसे पक्षकार के पक्ष में जो ऐसे अतिशेष के लिए हकदार हो निर्णय दे सकेगा।
(छ) लिखित कथन से संबंधित नियमों का लागू होना-- प्रतिवादी द्वारा  दिए गए लिखित कथन से संबंधित नियम प्रतिदावे के उत्तर में फाइल किए गए लिखित कथन में को भी लागू होंगे।

   जहां प्रतिवादी किसी वाद में वादी के विरुद्ध ऐसा दवा रखता है जिसके लिए वह एक पृथक वाद संस्थित कर सकता हूं वहां वह ऐसे दावा का विद्यमान मामले में प्रति दावा के रूप में उस तथ्य का उल्लेख करते हुए जिस पर की वह आधारित है, अपने लिखित कथन उठा सकता है लेकिन ऐसा  प्रति दावा उस  न्यायालय के आर्थिक क्षेत्राधिकार की सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।

  ऐसे प्रति दावे का प्रभाव प्रतिवाद मैं के वाद पत्र के प्रभाव के समान होगा जिससे कि न्यायालय मूल दावे और प्रति दावे दोनों के संबंध में अंतिम निर्णय देने के लिए समर्थ हो जाए।
यदि वादी ऐसे प्रति दावे का उत्तर देने में चूक करता है तो न्यायालय ऐसे प्रति दावे  के संबंध में
वादी के विरुद्ध निर्णय दे सकेगा।

ऐसा प्रति दावा एक वाद पत्र के समान समझा जाएगा और उस पर ऐसे सभी नियम लागू होंगे जो कि वाद पत्र पर लागू होते है।

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय - -

( 1) आदेश 8 नियम 6 (क) -प्रतिवादी द्वारा प्रति दावा कब अनुघेय है? इस प्रावधान में प्रयोगित शब्दावली महत्वपूर्ण है--" प्रति दावे के रूप में" और "अधिकारिता अथवा क्लेम"-- प्रति दावे का संबंध किसी हक अथवा क्लेम से अवश्य होना चाहिए जो प्रतिवादी के प्रति उत्पन्न वाद हेतुक से जुड़ा हो-- उसके द्वारा प्रस्तुत क्लेम और वाद हेतुक में परस्पर समानता अथवा क्रियाशीलता होनी चाहिए-- अभी निर्धारित, प्रस्तुत मामले में जो नुकसान हुआ है वह उस व्यक्ति द्वारा हुआ है-- जो कि वाद में पक्षकार नहीं है-- प्रतिवादी को प्रति दावा प्रस्तुत करने का कोई हक नहीं है।
1995 (2) DNJ (Raj) 681




(2) जहां प्रतिवादी किसी वाद में वादी के विरुद्ध ऐसा दावा रखता हो, जिसके लिए वह एक पृथक वाद संस्थित कर सकता हो। प्रति दावा ला सकता है।
1972 एआईआर (सुप्रीम कोर्ट) 1043

(3) आदेश 8 नियम 6 (क) के उपनियम (1) के अनुसार प्रतिवादी अपना प्रति दावा प्रस्तुत कर सकेगा जो प्रभाव में 'प्रतीप वाद' के समान होगा- ऐसे प्रति दावे का वर्जन भी हो सकेगा यदि न्यायालय यह पाये की इससे उलझन बढ़ेगी, उचित नहीं होगा, झंझटों के बढ़ने की संभावना है और विचारण में विलंब होगा - वर्जन का प्रावधान आदेश 8 का नियम 6 ( ग) है - वर्तमान मामले में जो घोषणा व स्थाई व्यादेश हेतु था मैं बेदखली के अनुतोष का प्रति दावा सम्मिलित करना नाहक में घातक था - - अभी निर्धारित, वादी को हक प्राप्त था कि वह आदेश 6 नियम 16 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर प्रति दावे वाला अंश कटवा देवे।
1997 (2) DNJ (Raj)731

(4) प्रति दावा यथा समय प्रस्तुत किया जाना चाहिए। ऐसा कोई प्रति दावा वर्जित होगा जो--
(क) लिखित कथन प्रस्तुत करने के बाद अत्यधिक विलंब से, एवं
(ख) साक्षी बंद हो जाने के बाद,
प्रस्तुत किया गया हो।
1985 एआईआर (उड़ीसा) 260

(5) बाल के दोषपूर्ण निरोध के संबंध में कोई प्रति दावा उठाने हेतु परिसीमा अवधि क्या होगी? - अपने कब्जे में ताला लगाकर माल के दोष पूर्ण निरोध हेतु क्षति का दावा करते हुए प्रति दावा किया - - कमरे के कथित तालाबंदी के 5 वर्ष बाद दावा दायर किया - प्रति दावा दायर करने वाले प्रत्यर्थी को माल का निरोध करने के प्रथम दिन से ही जानकारी थी - अभी निर्धारित - प्रति दवा समय की परिसीमा से वर्जित था।
2007 (2)  RLW 1647

(6) प्रति दावे की पोषणीयता-- सह प्रतिवादी गण के विरुद्ध प्रति दावा निर्दिष्ट किया-- विवाद्यक विरचित करने साक्षी बंद करने के बाद प्रति दावा नहीं किया जा सकता है-- केवल इस आधार पर न्यायालय उक्त सह प्रतिवादी गण के पक्ष में डिक्री प्रदान नहीं कर सकता है कि अन्य प्रतिवादी गण द्वारा अपने प्रति दावे का कोई उत्तर दायर नहीं किया गया-- प्रति दावा दायर करके मुकदमेबाजी को किसी प्रकार के अंतर अभिवक्ता वाद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता-- प्रति दावे पर डिक्री खारिज की।
2007  (1) RLW RJ 472 (सुप्रीम कोर्ट)

(7) काउंटर क्लेम के अपवर्जन हेतु आवेदन पेश किया - - तर्क की बेदखली हेतु वाद स्वत्व वाद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता - - कोई भी आरोप या प्रकथन भूस्वामी और किराएदार के संबंध पर आधारित नहीं है - - पेश किया गया बाद केवल कब्जा हेतु प्रतीत होता है - - निर्णित, आदेश में अवैधता नहीं है।
2013 (2) DNJ  (Raj) 682

(8) जवाब दावा पेश करने के बाद काउंटर क्लेम पेश किया और विचारण न्यायालय ने इसे रिकॉर्ड कर लिया-- जवाब दावा पेश करने के बाद काउंटर क्लेम रिकॉर्ड पर नहीं लिया जा सकता-- अभिनिर्धारित, आदेश अवैध है व अपास्त किया।
2013 (2) DNJ (Raj) 674




(9) प्रतिवाद उस वाद हतूक के लिए दायर किया गया जो की लिखित कथन दाखिल किए जाने के पहले उत्पन्न हुए-- निर्णय, विचारण न्यायालय ने 90 दिनों के बाद प्रति दवा को पत्रावली पर लेकर कोई त्रुटि नहीं की।
2011 (1) DNJ  (Raj) 484


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4 comments:

  1. blogger_logo_round_35

    partivadi ki tarap se javab pes karnay ke bad kya counter claim nai kiya ja sakta ha kya plz tell me

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  2. blogger_logo_round_35

    Ydi vadi dwara apil me mulvad fail ho ,or cuntur karm ki apil fail na ho to kya hoga .Jbki vadi mulvad jeet chuka ho.

    ReplyDelete
  3. IMG_20210422_191605

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